5 Incredible Traditional Folk Art Forms of Bihar – बिहार की लोककलाओं का संसार

बिहार की भूमि सिर्फ महान सम्राटों और ज्ञान की धरती ही नहीं रही है, बल्कि यह कला और संस्कृति का एक ऐसा अनमोल खजाना है जिसकी चमक सदियों पुरानी है। यहाँ की दीवारों, आँगनों, कपड़ों और रोजमर्रा की चीजों में भी कला सांस लेती है। बिहार की लोककलाएँ (Folk Arts) यहाँ के समाज, प्रकृति, लोकगाथाओं और भावनाओं को खुद में समेटे हुए हैं।

आइए, इस ब्लॉग पोस्ट के जरिए हम बिहार की उन अद्भुत और विख्यात लोककलाओं के सफर पर चलते हैं, जो आज वैश्विक पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ रही हैं।

  1. मधुबनी पेंटिंग (मिथिला कला) – वैश्विक पटल पर बिहार की पहचान

जब भी बिहार की कला का जिक्र होता है, सबसे पहला नाम मधुबनी पेंटिंग या मिथिला कला का आता है। रामायण काल से जुड़ी यह कला मूल रूप से मिथिलांचल की महिलाओं द्वारा घर की दीवारों और आँगनों (अल्पना) पर बनाई जाती थी।

  • मुख्य विशेषताएँ: इसमें प्राकृतिक रंगों (जैसे हल्दी, नील, पलाश के फूल और चावल का घोल) का उपयोग किया जाता है। रेखाओं की बारीक कारीगरी और पूरी सतह को आकृतियों से भर देना इसकी खासियत है।
  • थीम: धार्मिक कथाएँ (जैसे कृष्ण लीला, राम-सीता विवाह), सूर्य-चंद्रमा, और प्रकृति के तत्व (मछली, तोता, कछुआ) इसके मुख्य विषय होते हैं।
  • वर्तमान स्वरूप: आज यह कला दीवारों से निकलकर कैनवास, साड़ियों, दुपट्टों और आधुनिक घरेलू सजावट के सामानों तक पहुँच चुकी है।

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  1. मंजूषा कला – अंग प्रदेश की अनूठी कहानी

भागलपुर और आसपास के अंग क्षेत्र की पहचान मंजूषा कला से है। यह भारत की एकमात्र ऐसी कला शैली है जो पूरी तरह से एक लोकगाथा (बिहुला-विषहरी की कथा) पर आधारित है और इसे एक क्रमिक कहानी (Sequential Storytelling) के रूप में दर्शाया जाता है।

  • मुख्य विशेषताएँ: मंजूषा कला में केवल तीन रंगों का ही मुख्य रूप से प्रयोग होता है—गुलाबी (Pink), हरा (Green) और पीला (Yellow)
  • मुख्य प्रतीक: इस कला में सांप (नाग), लहरिया (पानी की लहरें), बेलपत्र और बिहुला के पात्र मुख्य रूप से उकेरे जाते हैं। इसे ‘सर्प कला’ (Snake Art) भी कहा जाता है।
  • सांस्कृतिक महत्व: मूल रूप से इसे बांस और जूट से बने बक्से (मंजूषा) पर बनाया जाता था, जिसका उपयोग पूजा-पाठ में होता था। आज यह आधुनिक फैशन और कैनवास आर्ट का हिस्सा बन चुकी है।

  1. टिकुली कला – कांच और सोने के वर्क का जादू

पटना और इसके आसपास के क्षेत्रों में जन्मी टिकुली कला का इतिहास लगभग 800 साल पुराना है। ‘टिकुली’ का अर्थ होता है बिंदी। मुगल काल में इस कला को बहुत संरक्षण मिला।

  • निर्माण प्रक्रिया: यह बेहद बारीक और धैर्य का काम है। इसमें पहले कांच या लकड़ी (MDF बोर्ड) के टुकड़ों पर बेस तैयार किया जाता है। फिर उस पर सोने के वर्क (Gold Foil) और बारीक ब्रश से पेंटिंग की जाती है।
  • थीम: इसमें ज्यादातर भारतीय पौराणिक कथाओं, विशेषकर कृष्ण की रासलीला और ग्रामीण जीवन के दृश्यों को दर्शाया जाता है।
  • आधुनिक मोड़: कभी महिलाओं के श्रृंगार का हिस्सा रहने वाली टिकुली आज खूबसूरत कोस्टर, वॉल हैंगिंग, और ज्वेलरी के रूप में पूरी दुनिया को आकर्षित कर रही है।

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  1. सुजनी कढ़ाई – धागों से लिखी जाती हैं कहानियाँ

सुजनी बिहार की एक पारंपरिक कढ़ाई कला है, जिसे मुख्य रूप से मुजफ्फरपुर और भूसरा गाँव की महिलाओं ने जीवित रखा है। इसे भौगोलिक संकेतक (GI Tag) भी प्राप्त है।

  • कला का मूल: पुराने समय में घर की महिलाएं पुराने कपड़ों और साड़ियों को एक के ऊपर एक रखकर (क्विल्टिंग की तरह) उन्हें रंग-बिरंगे धागों से सिलती थीं ताकि नवजात शिशुओं के लिए मुलायम बिछौना तैयार किया जा सके।
  • सिलाई की विशेषता: इसमें साधारण ‘रनिंग स्टिच’ (भरथुआ सिलाई) का उपयोग होता है, लेकिन इसके जरिए कपड़े पर जो आकृतियाँ उभरती हैं, वे बेमिसाल होती हैं।
  • थीम: सुजनी सिर्फ सुंदर डिजाइन नहीं बनाती, बल्कि यह महिलाओं के सुख-दुख, सामाजिक कुरीतियों (जैसे घरेलू हिंसा या दहेज प्रथा) और बदलते समाज की कहानियों को कपड़ों पर बयां करती है।

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  1. सिक्की आर्ट – सुनहरी घास की कारीगरी

मिथिलांचल के ग्रामीण इलाकों में पाई जाने वाली एक विशेष चमकदार घास, जिसे सिक्की कहा जाता है, से यह कला बनाई जाती है। इसे ‘गोल्डन ग्रास’ भी कहते हैं।

  • कैसे बनती है: इस घास को सुखाकर आकर्षक रंगों में रंगा जाता है। फिर महिलाएं अपने हुनर से इससे खूबसूरत टोकरियाँ (मौनी), बक्से (पेउती), खिलौने और सजावटी सामान बनाती हैं।
  • महत्व: यह कला पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल (Eco-friendly) है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था व महिला सशक्तिकरण का एक बड़ा माध्यम है।

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निष्कर्ष

बिहार की ये लोककलाएँ केवल मनोरंजन या सजावट का साधन नहीं हैं; ये यहाँ की मिट्टी का इतिहास, यहाँ के लोगों का संघर्ष और उनकी अदम्य जिजीविषा की गवाह हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती हुई ये कलाएँ आज डिजिटल युग में भी प्रासंगिक बनी हुई हैं।

जब आप बिहार की किसी कलाकृति को अपने घर का हिस्सा बनाते हैं, तो आप सिर्फ एक शोपीस नहीं खरीदते, बल्कि सदियों पुरानी एक जीवित संस्कृति को अपने करीब लाते हैं।